Tuesday, October 18, 2016

मेहमान

एक उलझी शाम 
बेफिक्र महमानों के नाम
अजब सी खामोशी छाई है
इंतजार में उनके ना 
आने वालों की कतार में
निमंत्रण स्वीकार कर 
ख़ुद को शामिल कर
बहाना बना मजबूरी का 
वक़्त की बेमानी का
फ़ायदा  उठाकर
टाल दिया आज 
जश्न-ए-जन्मदिन .....

है आख़े ओंझिल  क्यूँ ..?
बेफिक्र महमानों के खातिर
क्या वो समझे क्या वो जाने
नादाँन हैं  वो परिंदे 
बेफिक्र है वो दोस्त
हवाला वक़्त का देकर
समय के साथ समय के बाद
दो लफ्ज़ बोलकर ..सॉरी
नाराजगी दूर करगे वो...

अब ख़त्म होने लगी 
आरजू इंतजार की..क्यों ..?
अब इंतजार नही तो
ये खामोशी,ये निराशा
ये अजब सी बेचनी क्यों..?




मुस्कान वो चहरे की 
बिखेरती हमेशा मोती
ओस की बूंदों के 
चमकते कणों के समान
स्वागत हमेशा करती
मुस्कान से शुरुआत हो
जश्न-ए-जन्मदिन की....

पल है अभी आनंद का
तो फिर क्यों रुका जाये 
किस के लिए रुका जाये
आखिर किया क्या जाये
बस करना है एन्जॉय तो
बस एन्जॉय किया जाये

महक रहा है चहक रहा है
आँगन खुशियों को समेटे
घर की दहलीज के अन्दर
आपकी मुस्कान के साथ.... 
नेमी मीना

Great People.. Love You All :)