Tuesday, November 08, 2016

खुला आसमान


समंदर का किनारा, खुला आसमान
साहिल से टकराती लहरों के बीच
छाई है हर जर्रे जर्रे में है बेहोशी!
गुलाबी होंठ काले नैन,चन्दन सा बदन
क्या कुछ नहीं है उन घनी ज़ुल्फ़ों में,

एक सागर है हिलोरें मारता,
एक चाँद है उसकी वजह! 




लहराती जुल्फ़े,हवाओ में घोंलती
लीची सी ख़ुशबू की मदहोशी!
खामोश रहना,कुछ न कहना
कुछ ना कहकर,सब कुछ कहना
ये हवाओं की है सरगोशी!
कोई सलिका उनका,कुछ कह जाये
जो हम न समझ पाये,यही तो है
कुछ हमारी खामोशी!
मौसम है सुहाना,और चलते है जाना
खुला है आसमान,मंजर है दोषी...
करम है नजरों का,निगाहे नज़र बंद है
रुत है पिया मिलन की,है उस में गर्मजोशी.....!
*नेमी मीना*

Sunday, October 30, 2016

ख़ामोशियाँ मेरी

ख़ामोशियाँ तेरी 
नाराज़गी है क्या ?
बोल दो ना
विवाद, तकरार है क्या..?

वजह जो भी हो
सज़ा जो भी हो
कभी हम पर लागू हो
कभी तुम पर लागू हो
फिर ज़माना जो भी हो

फिर ये कहना सुनना 
अच्छा लगता है तुमसे 
बातों बातों में ही 
उलझना अच्छा लगता है

मिट जाती है थकान 
युही दिनभर की
जब एक मुस्करान 
सांझ को मिलने आती है
प्यार भरी
तकरार के बाद 
बातों की गपसप के बीच
काफ़ी की चुस्कियो के साथ
यही तो है प्रेम है ना प्रेम

Tuesday, October 18, 2016

मेहमान

एक उलझी शाम 
बेफिक्र महमानों के नाम
अजब सी खामोशी छाई है
इंतजार में उनके ना 
आने वालों की कतार में
निमंत्रण स्वीकार कर 
ख़ुद को शामिल कर
बहाना बना मजबूरी का 
वक़्त की बेमानी का
फ़ायदा  उठाकर
टाल दिया आज 
जश्न-ए-जन्मदिन .....

है आख़े ओंझिल  क्यूँ ..?
बेफिक्र महमानों के खातिर
क्या वो समझे क्या वो जाने
नादाँन हैं  वो परिंदे 
बेफिक्र है वो दोस्त
हवाला वक़्त का देकर
समय के साथ समय के बाद
दो लफ्ज़ बोलकर ..सॉरी
नाराजगी दूर करगे वो...

अब ख़त्म होने लगी 
आरजू इंतजार की..क्यों ..?
अब इंतजार नही तो
ये खामोशी,ये निराशा
ये अजब सी बेचनी क्यों..?




मुस्कान वो चहरे की 
बिखेरती हमेशा मोती
ओस की बूंदों के 
चमकते कणों के समान
स्वागत हमेशा करती
मुस्कान से शुरुआत हो
जश्न-ए-जन्मदिन की....

पल है अभी आनंद का
तो फिर क्यों रुका जाये 
किस के लिए रुका जाये
आखिर किया क्या जाये
बस करना है एन्जॉय तो
बस एन्जॉय किया जाये

महक रहा है चहक रहा है
आँगन खुशियों को समेटे
घर की दहलीज के अन्दर
आपकी मुस्कान के साथ.... 
नेमी मीना

Thursday, September 15, 2016

छोटी सी हूँ मै

बड़ी बड़ी क़िताबे
छोटी सी हूँ मैं

बातें है बड़ी बड़ी 
छोटी सी हूँ मैं

सपने भी है बड़े बड़े
लेकिन छोटी सी हूँ मैं

अरमान है बड़े बड़े
चाहते है बिखरी पड़ी
समेटना जो चाहूँ मै
बिखर सी फिर जाती है
क्यूँकी छोटी सी हूँ मै

ख्वाहिश कुछ अधूरी सी
है कसक उनमें बाक़ी
चाहूँ जो पूरी करना मै
क्यूँकी छोटी सी हूँ में
किताबें है बड़ी बड़ी.. 



अलमारी से झाँक कर
मुझको चिढा रही वो
बड़ी बड़ी सी किताबें 
मुझको बुला रही
समेटने को खुद मै
बंद पेजों की पंक्तियों में
मुझको उतरती
पर डर जाती हूँ 
सहम जाती हूँ मैं 
उलझ ना जाऊ कही
शब्दों के ताने बने में
पन्ने जब भी पलटती
क्यूँकी .............?
बड़ी बड़ी किताबें
छोटी सी हूँ मैं....

एहसास मुझे 
पल पल है होता
छोटी हुई तो क्या हुआ
होंसला है बड़ा बड़ा
किताब ही सवाल है
जवाब भी किताब है
ढूंड रही हूँ उनको में
क्यूँकी छोटी सी हूँ मै
ख़ुश हूँ खुशहाल हूँ मै.....

Monday, April 18, 2016

हाँ मेरा प्यार तुम्हारे लिए मेरे पास

आज फिर चल दिए
छुड़ा के हाथ मेरा तुम
आज फिर भुला दिए
किये थे जो कितने वादे तुमने



तू ही बता दे मुझे अब कि
जब जानती थी जाना तय है तुम्हारा
फिर भी इंतज़ार तेरा था क्यूँ
दिल इतना मज़बूर मेरा था क्यूँ।

आखिर, तूने किये तय वो रस्ते
जो शायद मैं ना कर पाती हँसके
अच्छा ही हुआ कि तुमने किया
हाँ, मैं शायद ना ही कर पाती
जो कर पाये तुम।

खेल शब्दों का तो अच्छा है
पर दिलों के खेल नहीं जानती
प्यार किया चाहे तुम थे या न थे
पर प्यार हमेशा था मेरे साथ
हाँ, मेरा प्यार, तुम्हारे लिए, मेरे पास।

Tuesday, February 16, 2016

.दिल्ली का आखिरी छोर

शायद इसे ही दिल्ली का आखिरी छोर कहते हैं।

Great People.. Love You All :)