Wednesday, December 18, 2013

ढूंढती तुम्हे यहाँ वहां

कहाँ हो तुम ए प्रिय...नजरे ढूढती तुम्हें यहाँ वहां
सन्नाटो के सरगम में या अपने ह्रदय की धधकन में....

देखती हु मै और पाती भी, पर दिल को क्यों समझाती भी
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तुम दूर हो मुझसे या यहीं कहीं, खोज रही हु पर मिलते नहीं

तुम अलग हो मुझसे या मुझमे हो, आँसुओ में या गीतों में हो

जहाँ भी हो मै समझ जाती हु, आंखे बंद करते ही तुमसे जुड़ जाती हु
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अपना ह्रदय तुम्हे दे दिया है या आत्मा का व्यापार हुआ है

कहते है ये दुनिया वाले

मुझे शायद प्यार हुआ है जुडी हु तुमसे यूँ कि जैसे जन्मो की साथी हु

इसलिये तुमसे दूर यूँ लगता है जैसे आधी हूँ आँखों में आँखे डाल जब तुम यूँ मुस्कुराते थे
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तुम्हारी आँखों क झीलों में ना जाने कितने गोते लगाये थे, तुमसे नही पता था अल्हड़ मस्त मै अधूरी हूँ

उन बाहों में लिपटते ही ये जान लिया मै पूरी हूँ, उन लबों के खुश्क नरमी का गवाह है सारा जहान

अब आ भी जाओ पास मेरे, ढूढती तुम्हे यहाँ वहां

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Deepankar Banerjee
Writer Intro
This post was written by Deepankar Banerjeea certified psychologist and really sensible poet. Deepankar continuously writes in his personal diary, today I got the possibility to steal his literary composition and post it here because he write this keep ME in his mind. He never published any post earlier.




Other Special Thanks to:
Special thanks to  my loving brother Arvind Sharma for Image-1, my friend Sudhanshu K Saxena for Image-3 and Ajay Sharma for Image-4 and last but not least Image-2 was selected by a gal in city.   



Great People.. Love You All :)