Friday, September 27, 2013

तन्हा अक़ेली चल रही थी

तन्हा अक़ेली चल रही थी
उन राहों पर जहाँ कोई अपना 
ना दिखता था,

राहें ऐसी जिसमे सिर्फ़
तूफान और ब्वन्डर 
ही दिखते थे,

सोचती थी रुक कर अक्सर,
कभी गिरी अगर तो,
कौन मुझे संभालेगा.

सोचती थी रुक कर अक्सर,
कभी रास्ता ना दिखा तो,
कौन मुझे दिखाएगा

जिंदगी की भीड़ मे भी
अक्सर तन्हा हो जाती
पर कुछ साँझ नही पा




आख़िर वो दिन आया
ठोकर लगी
पैर डगमगया

डर तो गई बहुत,
और हुई 
आँखें बन्द,

आँखें खुली तो
दिल मुस्कुराया

मंज़र था कुछ यों

मेरी छोटी हथेलियों
को जाने कितने 
हाथों ने पकड़ा था

ये देख दिल मुस्कुराया
और मुझे समझाया
फिकर थी तेरी बस
ऐसे ही,

तूने ना जाने कितने हाथ पाए


ना अब मैने कभी 
अपने को तन्हा पाया
दिल ने मुझे बहुत समझाया




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