Monday, July 22, 2013

मैं एक रास्ते पर चलती हूँ


मैं एक रास्ते पर चलती हूँ,
मैं एक रास्ते पर अकेली ही चलती हूँ,
छोटे मोटे पत्थर से डरती हूँ,
ना जाने कैसे वो पत्थर हैं,
चलते फिरते पैरों मे वो लगते हैं,
जाने कितने ही पत्थर रास्ते मे,
बस अलग अलग ही दिखते हैं,
शकलें अलग हैं पर कम एक ही करते हैं,
बस दुख ही देते हैं,
और बस दुःख ही देते है



मैं एक रास्ते पर चलती हूँ,
मैं एक रास्ते पर अकेली ही चलती हूँ,
जाने कितने ही मुसाफिर है इस रास्ते पर,
फिर भी क्यूँ तन्हा लगती हूँ,
इस रास्ते पर नये नये चेहरे मिलते हैं,
क्यूँ कोई चेहरा पूरे रास्ते साथ नही चलता,
तकदीर इन चेहरों को कुछ समय के लिए क्यूँ साथ ले आती हैं,
और बाद मे मे फिर से तन्हा कर जाती है,
जैसे साथ हो इनका बस इतना ही,
कैसे चलें पता भला तकदीर की रज़ा क्या है,
किसे इन रास्तों का हमसफ़र बनाना चाहता है


मैं एक रास्ते पर चलती हूँ,
मैं एक रास्ते पर अकेली ही चलती हूँ,
छोटे मोटे पत्थर से डरती हूँ,
ना जाने कैसे वो पत्थर हैं,
चलते फिरते पैरों मे वो लगते हैं,
जाने कितने ही पत्थर रास्ते मे,
बस अलग अलग ही दिखते हैं,
शकलें अलग हैं पर कम एक ही करते हैं,
बस दुख ही देते हैं,
और बस दुःख ही देते है, 

Great People.. Love You All :)